Abstract
डॉ. आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि में महिला सशक्तिकरण
Author : श्रीमती रश्मि संत
Abstract
भारतीय संविधान केवल शासन व्यवस्था का आधार नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा की स्थापना का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख है। डॉ अंबेडकर ने महिलाओं के आत्माभिमान और आत्मविश्वास को जागृत करने और उन्हें वर्षों के अंधकार से छुटकारा दिलाने के लिए संविधान के माध्यम से जो प्रयास किया वह निःसंदेह अतुलनीय है। संविधान सभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हुए उन्होंने वास्तव में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। उन्होंने संविधान के मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति निदेशक तत्वों में उन्हें स्थान दिया। भारतीय संविधान में छः मौलिक अधिकारों का समावेश किया गया है जो सामान्य दृष्टिकोण से स्त्री एवं पुरुष के हितों की रक्षा करते हैं। उन्होंने भारतीय समाज में विद्यमान जातिगत, सामाजिक एवं लैंगिक विषमताओं को समाप्त करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों को सामाजिक परिवर्तन के प्रभावी साधन के रूप में देखा। प्रस्तुत शोध का उद्देश्य भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकारों के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के स्त्री सशक्तीकरण संबंधी प्रयास तथा उसके समकालीन महत्व का विश्लेषण करना है। इन प्रावधानों के माध्यम से औपचारिक समानता के साथ-साथ वास्तविक समानता की दिशा में राज्य की सकारात्मक भूमिका का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रस्तुत शोध लेख में मुख्य रूप से मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति निदेशक तत्वों पर प्रकाश डालते हुए इस निष्कर्ष की ओर संकेत किया गया है कि डॉ. आंबेडकर का संवैधानिक चिंतन भारतीय महिलाओं को समान नागरिक के रूप में स्थापित करने और उनके सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक सशक्तीकरण की आधारभूमि तैयार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
