Abstract
विकसित भारत @2047 की परिकल्पना में भारतीय संस्कृति और साहित्य की भूमिका
Author : वेद प्रकाश पाल एवं डॉ. अजीत प्रियदर्शी
Abstract
भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा। इस ऐतिहासिक अवसर को ध्यान में रखते हुए भारत ने स्वयं को एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का संकल्प है। पर यह संकल्प केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय तथा नैतिक विकास को भी सुनिश्चित करना है। किसी भी देश की उन्नति और विकास केवल तकनीकी और औद्योगिक उपलब्धियों से नहीं मापी जाती, बल्कि उस समाज की सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक संवेदना तथा सामाजिक समावेशिता भी विकास के महत्वपूर्ण आयाम होते हैं। भारतीय साहित्य और संस्कृति सदियों से मानवता, सह-अस्तित्व, और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों को स्थापना करते आए हैं। यह शोध-पत्र भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक विकास में साहित्य और संस्कृति की ऐतिहासिक एवं समकालीन भूमिका का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना के संदर्भ में अध्ययन से स्पष्ट होता है कि साहित्य केवल भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्द्धन प्रेरणा का सशक्त साधन भी रहा है। अतः यह कहा जा सकता है कि साहित्य भारत की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिनिधि होने के साथ-साथ ‘विकसित भारत 2047’ की संकल्पना को साकार करने की दिशा में एक प्रभावी एवं प्रेरक शक्ति के रूप में स्थापित होता है।
