Abstract

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‘सदगति’ में प्रेमचन्द की ‘सह’ से ‘स्व’ की अभिव्यक्ति

Author : डाॅ0 सुरेश कुमार

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प्रेमचन्द की कहानी ‘सदगति’ भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, शोषण और मानवीय संवेदनहीनता का सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। इस कथा में ‘सह’ से ‘स्व’ की अभिव्यक्ति का आशय यह है कि व्यक्ति सामाजिक दबावों और परंपराओं के बीच रहते हुए भी अपनी आंतरिक पहचान और अस्तित्व को अनुभव करता है। कहानी का मुख्य पात्र दुखी चमार समाज की निम्न श्रेणी से संबंधित है, जो पंडित के आदेशों का पालन करने के लिए विवश है। वह अपने जीवन में लगातार अपमान और श्रम का सामना करता है, फिर भी उसके भीतर आत्मसम्मान की एक सूक्ष्म चेतना विद्यमान रहती है। प्रेमचन्द ने अत्यंत सहज शैली में यह दिखाया है कि किस प्रकार सामाजिक संरचना व्यक्ति के ‘स्व’ को दबाने का कार्य करती है, किंतु पूर्णतः समाप्त नहीं कर पाती। दुखी का जीवन और उसकी मृत्यु दोनों ही उस मौन पीड़ा और छिपे प्रतिरोध को व्यक्त करते हैं, जो व्यवस्था की कठोरता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह कहानी न केवल सामाजिक यथार्थ को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि हर व्यक्ति के भीतर एक स्वतंत्र ‘स्व’ मौजूद होता है, जो अवसर मिलने पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इस प्रकार ‘सदगति’ में व्यक्ति की गरिमा और आत्मबोध की गहन अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।