Abstract
भारत के रूपांतरण में उदीयमान सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण
Author : Dr. Vivekanand Singh & Dr. Kumudlata Singh
Abstract
भारत में उदीयमान सूचना प्रौद्योगिकी (AI, 5G/6G, IoT, ब्लॉकचेन, UPI, क्लाउड कंप्यूटिंग आदि) के माध्यम से हो रहे सामाजिक-आर्थिक-संस्कृतिक रूपांतरण का गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत है। मैनुअल कैस्टेल्स के नेटवर्क सोसाइटी सिद्धांत, एंटोनी गिडेंस के संरचनाकरण, पियरे बोर्डियू के डिजिटल कैपिटल और सांस्कृतिक पूंजी, जान वैन डिज्क के डिजिटल डिवाइड तथा सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ टेक्नोलॉजी (SCOT) और टेक्नोलॉजिकल डिटर्मिनिज्म के द्वंद्व को समाहित करते हुए अध्ययन दर्शाता है कि डिजिटल इंडिया ने समावेशी विकास को गति दी है, किंतु जाति, लिंग, ग्रामीण-शहरी, और आर्थिक असमानताएं अभी भी गहरी हैं।2025-26 के नवीनतम आंकड़ों (MeitY, NPCI, NSSO, GSMA, NITI Aayog, PIB) के आधार पर: इंटरनेट उपयोगकर्ता 97 करोड़+, UPI मासिक ट्रांजेक्शन 15-18 अरब+, India AI Mission में 38,000+ GPUs उपलब्ध। किंतु ग्रामीण इंटरनेट पहुंच 37-40%, महिलाओं में स्मार्टफोन उपयोग 35%, SC/ST घरों में डिजिटल पहुंच प्रमुख जातियों से 10-20% कम। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि प्रौद्योगिकी “समावेशी आधुनिकीकरण” का माध्यम बन सकती है, परंतु बिना मजबूत सामाजिक न्याय नीतियों के यह असमानता को पुनरुत्पादित करेगी।समाजशास्त्र में प्रौद्योगिकी को “सामाजिक निर्माण” तथा “संरचनात्मक निर्धारक” दोनों रूप में देखा जाता है।
