Abstract

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संस्कृत साहित्य और सांस्कृतिक उत्थानः विकसित भारत@2047 के आलोक में अनुशीलन

Author : डाॅ उमा सिंह

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संस्कृत साहित्य भारतीय मनीषा का वह अक्षय कोष है जिसमें मानव जीवन के सर्वांगीण विकास की समग्र एवं संतुलित अवधारणा निहित है। आधुनिक संदर्भ में ‘विकास’ प्रायः भौतिक समृद्धि, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी प्रगति तक सीमित कर दिया गया है, जबकि संस्कृत साहित्य विकास को शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के समन्वित रूप में देखता है। वैदिक संहिताओं से लेकर उपनिषदों, महाकाव्यों, धर्मशास्त्रों एवं दर्शन-ग्रंथों तक विकास को ‘अभ्युदय’ और ‘निःश्रेयस’ के संतुलन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह शोध-पत्र श्लोक-आधारित विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि संस्कृत साहित्य में भौतिक उन्नति साधन है, साध्य नहीं, और विकास की चरम परिणति आत्मबोध, मोक्ष तथा लोककल्याण में मानी गई है।