Abstract
विकसित भारत की दार्शनिक और नैतिक बुनियाद: सभ्यतागत लोकाचार, राष्ट्रीय मूल्य और एक नए भारत का विज़न
Author : Satyam Pandey & Dr. Ashok Kumar Shatpathi
Abstract
‘विकसित भारत’ की संकल्पना केवल आर्थिक प्रगति या तकनीकी उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन दार्शनिक परंपरा, नैतिक चेतना और सभ्यतागत लोकाचार पर आधारित एक समग्र विकास-दृष्टि है। भारतीय चिंतन परंपरा में विकास का अर्थ केवल भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि नैतिकता, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक उन्नयन के साथ संतुलित प्रगति है। यह शोध-पत्र भारत की विकसित राष्ट्र के रूप में अवधारणा के दार्शनिक एवं नैतिक आधारों का विश्लेषण करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय मूल्य और संवैधानिक आदर्श किस प्रकार एक नए भारत के विज़न को दिशा प्रदान करते हैं। इसके साथ ही इस ऐतिहासिक राष्ट्र की समृद्ध दार्शनिक विरासत जिसमें प्राचीन शास्त्र यथा वेदों से लेकर उपनिषद तक तथा श्रीमद्भगवद्गीता व आधुनिक भारतीय विचारक यथा स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, श्री अरबिंदो व के बी हेडगेवार आदि सम्मिलित हैं, के विचारों पर प्रकाश डालता है। वस्तुतः भारत की दीर्घकालिक, स्थायी, समावेशी व विकासात्मक आकांक्षाओं को साकार करने के लिए आध्यात्मिक व लोकसंग्रहपरक सिद्धांतों यथा – निष्काम कर्म, समत्व योग व योगः कर्मसु कौशलम आदि का नीतियों में एकीकरण आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि कोई भी समाज जो दर्शनशास्त्र को नकारने का प्रयास करता है, वह निश्चित रूप से पतन की ओर ही बढ़ता है क्योंकि समाज में अपेक्षित नैतिकता, तार्किकता, न्याय, समन्वय, बंधुत्व, सहिष्णुता आदि महत्वपूर्ण मूल्य इसके ही अध्ययन तथा प्रसार से समृद्ध होते हैं।
