Abstract
विकसित भारत की संकल्पना में दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य का समन्वित अध्ययन
Author : रोशनी देवी एवं डा० ज़ेबा खान
Abstract
विकसित भारत की संकल्पना केवल आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और तकनीकि प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के समन्वित विकास पर आधारित है। “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।”¹ यह युक्ति दार्शनिक विचार को सांस्कृतिक रूप से प्रस्तुत करती है और सांस्कृतिक चेतना जागती है। दर्शन भारतीय मनीषियों के द्वारा अनुभूत सत्य का परिचय देने वाला साहित्य है।हमारे अपूर्ण जीवन को पूर्णत्व की कोर्ट में पहुंचा देना दर्शन का वास्तविक उद्देश्य है।दर्शनशास्त्र, संस्कृति और साहित्य मानव साहित्य के विकास के आधार स्तंभ रहे हैं।यह क्षेत्र न केवल मनुष्य की बौद्धिक चेतना को रिहा करते हैं,बल्कि समाज के नैतिक,सांस्कृतिक और रचनात्मक स्वरूप को भी आकर प्रदान करते हैं।दर्शन जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन करता है। जैसे सत्य, अस्तित्व ज्ञान और मूल्य,संस्कृति जीवन शैली, परंपरा और विचारों का समुच्चय है,जबकि साहित्य मानवीय अनुभवों की सजीव अभिव्यक्ति है।इन तींनों का परस्पर संबंध अत्यंत गहरा है। दर्शन विचार देता है, संस्कृति उसे जीवन में उतारती है और साहित्य उसे भावनात्मक व कलात्मक रूप से प्रस्तुत करता है ।
