Abstract

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प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों का समायोजन

Author : डॉ राजीव कुमार गुप्ता

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भारतीय ज्ञान परंपरा की विकास पात्रा में हम बौद्धिक एवं वैचारिक रचनात्मकता स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। एक वाक्य में कहें तो 'भारतीय ज्ञान परंपरा सर्वांगीण पवित्रता एवं सार्थकता को पोषित एवं पल्लवित करती है।भारतीय ज्ञान परम्परा शिक्षा को चरित्र निर्माण और समाजोपयोगी बनाने पर बल देती है। यह आवश्यक है कि पाठ्यक्रम में योग, आयुर्वेद, गणित, खगोल, कृषि, पर्यावरण एवं दार्शनिक चिन्तन जैसे विषयों को समाविष्ट किया जाए। इससे विद्यार्थी न केवल रोजगार के योग्य बनेंगे बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति संवेदनशील भी होंगे। भारतीय ज्ञान प्रणाली का आशय केवल प्राचीन ग्रंथों, वेदों या शास्त्रों से नहीं है, बल्कि यह भारत की उस समग्र परम्परा से है जो हजारों वर्षों से विज्ञान, दर्शन, कला, गणित, चिकित्सा, खगोल, समाज और संस्कृति को दिशा देती आई है।आधुनिक विज्ञान ज्ञान के व्यवस्थित अध्ययन की एक विधि है, जिसमें अवलोकन, प्रयोग, और तार्किक निष्कर्षों के आधार पर प्राकृतिक और सामाजिक घटनाओं को समझा जाता है। इसे मुख्य रूप से प्राकृतिक, सामाजिक और औपचारिक जैसे तीन प्रमुख शाखाओं में बांटा गया है, जिनमें भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गणित और कंप्यूटर विज्ञान जैसे विषय शामिल हैं। आधुनिक विज्ञान का उद्देश्य अवलोकन योग्य प्रमाणों के आधार पर सिद्धांतों का निर्माण और परीक्षण करना है, जो निरंतर परीक्षण और शोध के माध्यम से विकसित या संशोधित होते रहते हैं। भारतवर्ष में भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का सदा से समन्वय रहा है।वेद एवं वैदिक वान विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ लेकर चलते हैं, फिर चाहे आयुर्वेद हो अथवा वास्तु।इस प्रकार भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का लक्ष्य एक रहा, दिशा एक रही, जन्म एक साथ हुआ विकास, परिवर्तन और निष्कर्षों की गति एक रही। इतिहास भी लगभग दोनों का एक समान ही है तो किस आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोध हैं। वस्तुतः तो दोनों एक-दूसरे के पूरक, सत्य की खोज में एक ही अस्तित्व को बढ़े हुए दोनों हाथ हैं।