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भारत में राजकोषीय नीति और आर्थिक विकास: एक विश्लेषण

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यह शोध पत्र भारत में राजकोषीय नीति और आर्थिक विकास के मध्य जटिल और गतिशील संबंधों का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास पथ को आकार देने में राजकोषीय नीति एक आधारभूत स्तंभ रही है, जो कराधान, सार्वजनिक व्यय और ऋण प्रबंधन के माध्यम से सतत विकास, मूल्य स्थिरता और सामाजिक न्याय जैसे व्यापक आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है । यह 1951 के प्रारंभिक रूढ़िवादी प्रबंधन से लेकर 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों और 2003 के राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम तक के राजकोषीय विकास की रूपरेखा तैयार करता है । शोध के निष्कर्षों में सरकार द्वारा हाल के वर्षों में अपनाई गई 'पूंजीगत व्यय प्रथम' रणनीति पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसका लक्ष्य बुनियादी ढांचे के विकास के माध्यम से रसद लागत को कम करना और निजी निवेश के लिए 'क्राउडिंग-इन' प्रभाव पैदा करना है । साथ ही, पत्र में वस्तु एवं सेवा कर (GST) के प्रभाव, प्रत्यक्ष करों की बढ़ती प्रगतिशीलता और सार्वजनिक ऋण की स्थिरता से संबंधित चुनौतियों का गंभीर विश्लेषण किया गया है । अंत में, शोध यह निष्कर्ष निकालता है कि 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भौतिक बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी (शिक्षा व स्वास्थ्य) के निवेश के बीच संतुलन बनाना, कर-आधार का विस्तार करना और पारदर्शी राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना अनिवार्य है।