Abstract

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संस्कृत साहित्य में प्राप्त कला और संस्कृति का विकसित भारत में महत्व

Author : डॉ लक्ष्मी नारायण एवं आकांक्षा यादव

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संस्कृत साहित्य भारतीय सभ्यता की आत्मा का प्रतिबिंब है, जिसमें कला और संस्कृति के विविध रूप अत्यंत सूक्ष्मता और गहराई के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। प्राचीन ग्रंथों—जैसे वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा नाट्य और काव्य साहित्य—में न केवल धार्मिक और दार्शनिक विचार मिलते हैं, बल्कि संगीत, नृत्य, नाटक, स्थापत्य और चित्रकला जैसे कलात्मक आयामों का भी सजीव वर्णन मिलता है। ये ग्रंथ उस समय की जीवनशैली, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। विकसित भारत के संदर्भ में संस्कृत साहित्य का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक है। आज के बदलते वैश्विक परिवेश में, जहां सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ने का खतरा है, वहीं संस्कृत साहित्य हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है। यह न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करता है, बल्कि नैतिक मूल्यों, रचनात्मकता और समग्र विकास की दिशा भी प्रदान करता है। इस प्रकार, संस्कृत साहित्य में निहित कला और संस्कृति विकसित भारत के निर्माण में मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।