Abstract
समग्र शिक्षा के लिए कला को एकीकृत करना: एक शैक्षिक दृष्टिकोण
Author : डॉ. परमा नन्द त्रिपाठी
Abstract
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बालक के सम्पूर्ण विकास को सुनिश्चित करना है, जिसमें बौद्धिक, भावनात्मक, सामाजिक, रचनात्मक और आध्यात्मिक आयाम शामिल होते हैं। यह संकल्पना ही “समग्र शिक्षा” की आधारशीला है। समग्र शिक्षा का सार न केवल इस बात में है कि शिक्षार्थी ‘क्या’ सीख रहा है, बल्कि इस बात मे भी है कि वह ‘कैसे’ और ‘क्यों’ सीख रहा है। वर्तमान की शिक्षा प्रणाली में यह महसूस किया जा रहा है कि केवल विषयवस्तु आधारित शिक्षण छात्रों की संपूर्ण प्रतिभा का पोषण नहीं कर पा रहीं हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का चातुर्दिक विकास नहीं हो पा रहा हैं। ऐसी स्थिति में कला को शिक्षा में एकीकृत करना एक सशक्त उपाय के रूप में सामने आया है। कला-आधारित शिक्षा केवल पढ़ाने का तरीका नहीं, बल्कि अनुभव करने, महसूस करने, सोचने और अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया है। यह शिक्षा को सूचनात्मक शिक्षा से अनुभवात्मक और आनंदमय शिक्षा में बदल देती है। इससे विद्यार्थी केवल अच्छे छात्र नहीं बल्कि जागरूक, संवेदनशील, रचनात्मक, भावनात्मक रूप से संतुलित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नागरिक बनते हैं। कला न केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम है बल्कि यह समझ विकसित करने, विश्लेषण, आत्म-अन्वेषण और भावनात्मक संतुलन का मार्ग भी प्रशस्त करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी इस बात को गंभीरता से रेखांकित किया है कि कला का एकीकरण शिक्षण को अनुभवजन्य, सहभागितापूर्ण और आनंदमय बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह शोध आलेख इसी दृष्टिकोण की सिद्धांत से लेकर व्यवहार तक गहराई से विवेचना करता है।
