Abstract

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जसिन्ता केरकेट्टा के काव्य में प्रकृति-चिन्तन की अभिव्यक्ति

Author : प्रो. अनिता सिंह एवं रोशनी लोधी

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'प्रकृति-चिन्तन' साहित्य की आज मूल विषयवस्तु है, हालांकि अगर हम गौर करें तो हमें प्रकृति-चिन्तन वेदों में भी दिखाई देता है। साहित्य की शुरुआत ही प्रकृति-चिन्तन से होती है। वेदों में अग्नि, बारिश कराने वाले इन्द्र, हवा देने वाले वृक्ष की स्तुति की गई है। कालान्तर में उपनिषदों में भी प्रकृति-चिन्तन दिखाई देता है। रामायण का अरण्यकांड प्रकृति की विशेषताओं का वर्णन करता है और महाभारत का अज्ञातवास। हिन्दी साहित्य में आदिकाल और भक्तिकाल में प्रकृति-चिन्तन मुख्य रूप से नहीं दिखाई देता, किन्तु रीतिकाल और आधुनिक-युग में छायावाद में प्रकृति-चिन्तन अपने प्रकर्ष पर दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप सेनापति, द्विजदेव का वर्षा- चित्रण और छायावाद में पन्त और महादेवी जी का वर्षा-चित्रण। महादेवी जी लिखती हैं- "रूपसि तेरा घन केश पाश।" सन्तोष चौबे ने 'विश्व रंग सम्वाद' पत्रिका के 'आदिवासी विशेषांक' के अपने सम्पादकीय में लिखा- "आदिवासी साहित्य अपने जल, जंगल और जमीन, अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने की एक आर्त पुकार है।" महत्वपूर्ण तथ्य है कि आदिवासी साहित्य पर्यावरण-संरक्षण की मधुर नहीं अपितु एक करुण पुकार है।